शेरों की बस्ती

गिरने और संभलने की रवायत चली ऎसी,
सफर आसाँ भी था तो मुश्किल बना डाला।

(मेरा गीत)
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आज मेरा घर कहकहों से गूँज रहा था,
दिल के दर्द को छुपाना कोई हमसे सीख ले।
(कोई पहचान सका क्या?)

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"मुझे छोड के सफर में सो रहे हो तुम?"
मेरी कब्र के सिरहाने कोई गा रहा था कल।
(मजबूरः तब भी, अब भी)

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मैं तो बंजारा हूँ, ना टिका ना रुक सका कभी,
दो पल साथ जी लो, फिर खुद चला जाउँगा।

(एक गुजारिश)
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रिश्तों की गर्दिश में तसव्वुर ढूँढते लोग,
दिल की गलियों में अपना गिरेबान झाँकते हैं।
(रिश्तों के पहरुओं की सच्चाई)
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दो अश्क गिराये हैं देखो मेरी कब्र बनाके,
झूठी कसमों से हाय एक रस्म निभा दिया।
(रिश्तों पे सच की चोट)

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आवारा हो तुम, तुम्हें रिश्तों की समझ क्या,
एक अनाथ की हैसियत से खेलती दुनिया।
(किसे रिश्ता निभाना आता है?)

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जहन्नुम के नस्ल की अदाकारी का शौकीन,
अपना कोठा जला संसद में सो रहा देखो।
(देश की राजनीति पर)
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इस शाम शायद फिर से भूल हुई थी,
मेरे शाँत क्षितिज पे फिर धूल उडी थी;
आज चौबीस साल बाद तेरी याद आयी,
उसी समँदर किनारे देखो भाग आयी।
(मेरी जिंदगी का गीत मेरे लिये)
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मुझे इश्क ना था तो पागल कहा तुमने,
कहीं दिल आ गया तो कातिल बना डालोगे।
(थोडा सा रुमानी हो जाये)
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एक जमाने से हँसते हुये ये गा रहा था गीत,
उदास गलियों से गुजरे हुये बरसों गुजर गये।
(बस, हँसता रहूँगा)
.......

कृते - १३॰४॰२००७

ललकार

कैसी राह चल पडे हम कि नींद भी ना ख्वाबों में,
सप्तऋषि और इँदृधनुष भी आ गये मेरी राहों में।

सात समँदर के तटों पर ऐसा रथ है मैनें देखा,
सात रँगों से बुना था बादलों पे ऐसी रेखा;
सात ऋषियों के गुणों से तर बतर मेरा है नभ,
जाने कैसा भाग्य है और कैसी मेरी देखो लेखा।
सात सुर की गूँज छेडी और भागता देखा जहाँ,
आज नभ में आँधी आई और झूम नाचे सब यहाँ;
जिस्म ने है सर उठाई, दिल ने है अब पग बढाये,
आज रक्तरंजित होगी भूतों की टोली कहाँ।
कैसी मंजिल पे बढा मैं, कैसे सपने ये गढा मैं,
किस दिशा लूं अँगडाई, या चल रहूँ मैं ख्वाबों में।।

नाश-नश्तर कील-पत्थर, तोडता मेरा तूफान,
तितलियाँ और रंगवलियाँ, चूमते मेरा निशान;
ये विराट कर्म कब है धर्म की डोली चढा,
सदियों में जो ना हुआ, अब क्या हो मुझको पता।
मौन पर्वत की कसम, मदमस्त होके लौटूँगा,
अन्यथा मेरी चिता पर सूर्य अग्नि पोतेगा;
सिंदूरी है माँ का सर और सिंदूरी मेरा कफन,
गर रस फुहारें लेके लौटूँ, तो होगा यहाँ जशन।
ऐसे वादों के लिये, अब क्या चिता और क्या कफन,
अब तो चाहे हो प्रलय, ना सोऊँगा इन ख्वाबों में।।

पृथ्वी के है गर्भ अग्नि, था ये मैनें जब सुना,
उस पल से इस स्वप्न को, रहगुजर ने था चुना;
अपने धर्म को मारकर, मेरे कर्म ने किया हुँकार,
मैं फिर मरा, पर जी पडा, ऐसा जीवन किसने बुना।
कौन खींचता मेरा रथ, और किसकी है ये पुकार,
किस मायावी ने मत्थे टेके, सुनकर मेरा ललकार;
किसकी गालों पे लाली चमकी, किसका सर ऊँचा उठा,
किसकी करनी, कौन जीता, और मैंने छेडा मल्हार।
कौन रोके कौन टोके, कौन चौंके इस रहगुजर से,
कौन मेरे रथ पे बैठे, मेरे साथ मेरे ख्वाबों में।।

(कृतेः १३॰०३॰२००७)

धुँध

मैं तन्हा था,
अकेला,
वीराने में करता रहा सफर।
उम्मीदों में भूला,
क्रँदन को तुला,
न छोडी थी मैंने कोई कसर,
और उसी रास्ते पे,
चला जा रहा था, अनवरत।

अचानक, परली तरफ से आती हुई,
बंजारन की तरह,
जैसे मेरी ही तलाश थी उसे,
मुझसे टकराई,
एक सुखद एहसास,
जैसे हो जीवन का एक तीखा-सा आभास।
गले लग गई बिना हाल पूछे,
भौंचक्क मैं देखता रह गया।
थोडी देर तक आँख मींचता रहा और,
"कहाँ थी अब तक?"
शिकायतों का अँबार,
बेताबी का गुबार।

"यहीं तो थी,
इस बार सर्दी थोडी लंबी पड गयी,
और तुम्हें याद नहीं?
तुम कुहरे में देख भी तो नहीं पाते!"

धुँध तो अब भी है,
जन्मों की तरह,
एक गूँज छेडी थी मैंने,
तुम्हारे लिये कई साल पहले,
अब तक तो सन्नाटे उसे निगल गये होंगे।
और तुम अब आई हो?
पता है,
कितनी बार मर चुका हूँ मैं अब तक?

वो मुस्कुराई,
थोडी सी दबी-हुई, टिमटिमाते पलकों के झुरमुट में,
फिर थोडे से फूल बरसे,
चमकती हुई दाँतों के भीतर से,
जैसे तरसी हुई थी अधरें बरसों से।
तरसा तो मैं भी था,
और मेरी तरस में झंकार भी थी,
पर शायद मोल नहीं था उसका।
थोडी ठँढक थी बाहर,
और भीतर भी,
मैंने उसके हाथ पकडे,
और पास पडे हुए बेंच की ओर बढ गया।

"तुम्हें तो आज भी जल्दी होगी जाने की?
इस बार मैं भी कहीं चला जाउँगा।"

"तुम तो शुरू से ही खानाबदोश रहे,
न तुम कहीं टिक सके, न तुम पर कोई टिक सका।
मुजरिम थे तुम,
भावनाओं के, संभावनाओं के,
ऐसे कोई जीता है भला!
एक मैं ही हूँ मूर्ख,
जो बार-बार तुमसे टकरा जाती हूँ।
तुम अब रास्तों को छोड क्यों नहीं देते?"

"तुम बदली नहीं अभी तक,
थोडी लम्हों जैसी, थोडी सपनों जैसी,
और ये रास्ते,
ये रास्ते ही तो मेरी जिन्दगी हैं।
जब तक जिन्दा हूँ, शायद चलता रहूँगा,
हर साल सर्दियों में तुमसे मिलता रहूँगा।
ये कोहरे,
ये अक्सर तुम्हारी याद दिलाती हैं।
हर धुँध में, मैं ढूँढूँगा तुम्हे,
उन लतरों के पीछे, और हमारे दर्दों के नीचे,
तडपा करूँगा, और ढूँढता रहूँगा।
जानता हूँ कि मेरी किस्मत में सरफरोशी लिखी है,
और तुममें बेवफाई।
तुमपर तो बँदिशें भी थीं और मैं आवारा था,
और आखिर मैंने ही तो इन सपनों को सँवारा था,
और एक एहसान था तेरा,
उनको संभाल के रखने का।
मुझे याद है तुम्हारी वो चपतें और वो गुस्सा,
जब मैं सिगरेट पिया करता था।
आज पूर्णविराम क्यों नहीं लगा देतीं,
मेरे जीवन पर,
आज तो मैं सबसे बडा पाप कर रहा हूँ।
दे दो सजा, या फिर आ जाओ मेरे पास,
या तो खत्म कर दूँ ये सफर, या फिर अधूरा क्यों रहूँ,
और क्यूँ रहूँ मैं इन रास्तों पर भटकते हुए॰॰॰॰॰

"मेरे जाने का समय हो गया,
मैं चलती हूँ अब।
तुम अपना ख्याल रखना।"
उसने उठकर गले लगाया
और झट से दौडती हुई कोहरे में गुम हो गयी।

"तुम मुझे कभी सुनती ही नहीं!"
एक शुष्क आह ली, कॉलर सीधे किये,
और बढ गया मैं फिर,
उन्हीं तन्हा राहों पर,
अकेला,
धुँध से लडता हुआ।

(कृतेः११॰१२॰२००६)

प्रश्न

नीले क्षितिज के तट पर
उन्मत पक्षियों की
स्वछन्द उडानों को देखकर अक्सर सोचता हूँ
कि सागर के गहरे पानी में
खोती हुई लहरें
क्या विलीन होने के लिये ही
इतने ऊँचे छलाँग भरती हैं।

सत्य से अटल खडे हुए
जिद्दी उजले पहाडों से उत्तर माँगता हूँ
कि इतने उतीर्ण होते हुए भी
हार क्यों मान गया तू
दूर सोये हुये आकाश से।

अन्धेरी रातों में
चमकते सितारों एवँ बदलते चाँद से
अभी भी मैं पूछता हूँ
वे इतने बहादुर क्यों नहीं
कि एक सूरज के सामने क्षण भर टिक सकें।

और जमीन पर मृत्योन्मुख लोगों ने
अब तक मुझे जवाब नहीं दिया
कि प्रेम की बगिया में
समय का पतझड
दुःखों कि आँधी क्यों लाता है?
क्या उनका विश्वास इतना भी अटल नहीं
कि वे पू्र्ववत चमकते रहें।
जैसे सूरज को कभी कोई फर्क नहीं पडता
जबकि कितने ग्रहणों का मार झेला है उसने।

(कृतेः १६॰९॰२००३)